Saturday, May 17, 2008

औरत का एक चेहरा ऐसा भी --पहचान लें

*****औरत का एक चेहरा ऐसा भी --पहचान लें *****


गुलाबी शहर को लाल करने वाले अपराध, हिंसा, दहशत और आतंकवाद फैलाने में सफल हो गये. पीछे रह गया तो शोक , दुख: और बदले की भावना. क्या इन दुखी परिवारों में से कोई द्वेष और बदले के लिए एक नया आतंकवादी का जन्म तो नहीं होगा। इंटेलीजेंस ने इन हमलों के लिए एक संदिग्ध महिला का स्केच जारी किया है। औरत के अनेक रूप होते हैं माँ, बहन , बेटी, पत्नी, देवी ......... पर अब आतंकवादी भी हो गयी.
सरकार और कई अन्य संगठन महिलाओं को आरक्षण देने और समानता के अधिकार के लिये कोशिश कर रहे हैं पर समानता का अधिकार वो भी इस क्षेत्र में!!! अगर यहाँ भी आरक्षण की मांग होने लगी तो क्या होगा!!! ऐसा ना ही हो तो अच्छा है।
नोट: इससे ये ना समझा जाये कि मैं महिलाओं के आरक्षण या उनके अधिकारों का विरोधी हूँ।

9 comments:

Dr.Parveen Chopra said...

इस के बारे में सोचते हैं तो सर फटने लगता है, भाई। सीधे साधे, प्रभु-भक्त लोगों के साथ इतना धक्का .....इन लोगों में से हरेक बंदा अपना घर का , अपने परिवार का, अपने गले-मुह्लला का बादशाह होता है और अपने बच्चों का हीरो होता है और ये सारे हीरो पलक झपकते ही ज़ीरो हो गये। सोच कर ही मेरा मन रो रहा है। बस इतनी दुआ ज़रूर करता हूं कि जब इस तरह की दरिंदगी करने वाले लोग पकड़ में आयें तो इन को ऐसी सजा मिलनी चाहिये कि ये ना तो ज़िंदा ही रहें और ना ही मरें......बस इतना तड़फें कि लोगों को सीख आ जाये कि अंत बुरे का बुरा....लेकिन मेरे सोचने से कुछ होना वोना नहीं है.....पहले लोग..खास कर महिलायें किसी की मौत होने पर हाय-हाय कर के छाती पीटा करती थीं, अब मैं अपने मन के भाव प्रकट करने के लिये इस की-पटल की चाबियों को पीट रहा हूं। और क्या करूं.......यही सोच रहा हूं कि अब बहुत बहुत बरसों तक चलने वाले केस शुरू होंगे...पता नहीं कितने लंबे, कितने पेचीदा, कितने टेढ़े......कितने मेढ़े...........बस, अब आगे नहीं लिखा जा रहा है........सोच कर भी शर्म आती है कि हम कहां रह रहे हैं.............

Udan Tashtari said...

जघन्य अपराधियों में लिंग भेद ठीक नहीं-यह मानसिकता का सवाल है लिंग का नहीं. पशूवत व्यवहार दोनों लिंगों का समान अधिकार है जैसे वहशीपना और पागल पना!! दोनों दंड के बराबरी से अधिकारी हैं.

रचना said...

criminal is a neutaral gender
केदी भी लिन्ग भेद मए नहिन आता आतंकवादी भी नूयट्र्ल ही हे .

Lovely kumari said...

aap to aise bat kar rhen hain jaise atankvadiyon ko sarkar ne bahal kiya hai.jo bhi aisi bichardhara ko manta hai wah mansik rup se bimar hai chahen stri ho ya purush,aur bimar to koi bhi ho sakta hai.mahilaon ki sanliptata aschary badhati hai kyonki inhe bahut dayalu mana jata hai par iska matalab yah nhi ki har insan ek sa ho.

आईना said...

मंडलों,चोखेर्बलियों, सिंघलों और आतंकवादियों से......

मत बांटो लिंग, जाति और धर्म के नाम पर समाज को,
गुरूद्वारे की वाणी, मन्दिर की घंटियों और मस्जिदों की नमाज को.

माना कि मसीहा का दर्जा पाओगे इक दिन अपने समूह से,
लेकिन यकीं मुझको भी है कि नजरें न मिला पाओगे अपने रूह से.

भूख, गरीबी, उत्पीडन की बात और नजरें आसमान पर,
ये वो लोग हैं जो मर्ज को जिंदा रखते दवा के नाम पर.

रहनुमाई कि आड़ में ये समाज के लिए आस्तीन के सांप है,
मुहिम छेडो इन्हें बेनकाब करने की तब तो कोई बात है.

एक पाठक

कामोद Kaamod said...

आप सभी का आभार.
@ समीर जी, @ रचना जी ,@ आइना, @ लवली कुमारी जी..
एक बात यहाँ स्पष्ट करनी जरूरी है कि यह पोस्ट किसी तरह के लिंगभेद के लिए नहीं बल्कि नारी के बदलते कार्यक्षेत्र पर है.अपराध और अपराधियों का चेहरा,जाति, धर्म या लिंग नहीं होता. आतंक ही इनका चेहरा है.
@ डॉ प्रवीन चोपड़ा जी
ऐसे अपराधियों के लिये किसी तरह के केस चलाने की जरूरत नहीं है. तुरंत फैसला और सार्वजनिक सजा की एक हद तक इसका समाधान हो सकता है.

rewa said...

@kamod, "ऐसे अपराधियों के लिये किसी तरह के केस चलाने की जरूरत नहीं है. तुरंत फैसला और सार्वजनिक सजा की एक हद तक इसका समाधान हो सकता है."
I agree with your views. But, have just a simple quest to you. what about a rapist? Kya aise logon per case chalane chahiye lambi samay tak? Ya inhe turat mout ki saza suna deni chahiye?

Your views are most welcome on my comment.

rgds,
rewa
www.rewa.wordpress.com

कामोद Kaamod said...

@ rewa, अपराध निर्धारित हो जाने पर सज़ा दी जाती है जैसा हमारे कानून और संविधान में निर्धारित है. पर सज़ा देने का तरीका बिल्कुल सही नहीं है. इससे ना तो अपराध कम या समाप्त होता है और ना ही जनता के पास कोई संदेश जाता है. इसलिए सज़ा देने के तरीके में बदलाव करने की जरूरत है .कुछ ऐसी सज़ा जिससे अपराधी अपराध करने से पहले 1000 बार सोचने को मज़बूर हो जाये.
जहाँ तक आप बलात्कारी को सज़ा देने की बात करती हैं तो इसके लिए मैं एक हद तक पीड़ित महिला या परिवार को दोषी मानता हूँ.70% मामलों में या तो परिवार द्वारा या समाज के डर से पुलिस के पास नहीं जाते. 20% मामलों में आपसी निपटारा कर लिया जाता है. 8% मामले न्याय के लिए लम्बे समय तक इंतजार करते हैं. 2% मामलों में जनता जनार्दन अपना निर्णय अपने विवेक के आधार पर तुरंत कर देती है. ऐसे अपराध के लिए मौत से कम सज़ा नही होनी चाहिए.

rewa said...

@Kamod, Achha chaliye maan gayi. lekin jo 1% jate hein nyay ke liye unhe 10sal tak jhelaya jata hai? Kya unhe turat dandit nahi karna chahiye? yeh sab problem hamare system ka hai. kyunki wo 70% log jo nahi jate hein bus yeh sochkar ki beti ka fuiture dekhna hai. Wo yeh sochte hein ki jane se bhi kuch nahi hoga...balki case kayi salon tak chalega parega.


Rapist sadkon per aaram se ghumte hein, aur main iska 80% jimmewar apne system ko manti hun.