Sunday, September 6, 2009

ब्लॉगिंग का धर्म

*****ब्लॉगिंग का धर्म*****
पिछले कुछ दिनों से ब्लॉग जगत में ब्लॉगिंग हिन्दू बनाम मुसलमान बन रही है। ब्लॉगर ताल ठोकर खुद हो साबित करने का प्रयास कर रहा है। हिन्दू मुसलिम विवाद यहाँ साफ दिखाई देता है । क्या यह ब्लॉगिंग और ब्लॉग जगत में धर्म का प्रवेश है।

ब्लॉगिंग का धर्म

ब्लॉगिंग का भी होता है धर्म
धर्म जिसका नहीं कोई मर्म
धर्म हिन्दू है या मुसलमान
इससे हूँ मैं अनजान

ब्लॉगिंग का धर्म कहाँ से आया
जिसने ढ़ूँढ़ा उसने पाया
ढ़ूँढ़ी गई ब्लॉगिंग की जात
फिर मचाया उस पर उत्पात

तेरी लेखनी हिन्दू है
तेरी लेखनी मुसलमान
धर्म आया बीच बन दीवार
किसने दिया तुमको ये अधिकार

बाँट दिया जिसने जग सारा
क्यूँ लेते हो उसका सहारा
बनाओ इसे यूँ आवारा
यही तो है हमारी एकता का सहारा


-कामोद


13 comments:

mehek said...

sahi baat keh di, aur sahi waqt par.

Vivek Rastogi said...

बिल्कुल सही अब ब्लॉगरों के भी धर्म हो गये हैं अगर दोनों के शब्दों को ध्यान से देखेंगे तो शायद हिन्दी के ही पाये जायेंगे और उन्हें अलग करना बहुत मुश्किल है जैसे दोनों धर्म के लोगों का खून मिलाकर अलग कर पाना बहुत मुश्किल है। बढ़िया बात और संदेश बस लोग समझ लें।

संगीता पुरी said...

सुंदर संदेश देती खूबसूरत रचना !!

अजय कुमार झा said...

काश कि इंसानियत का धर्म सभी निभा सकें....तो सब ठीक हो जायेगा.....

Pt.डी.के.शर्मा"वत्स" said...

धर्म का वास्तविक अर्थ यदि ये लोग समझ लें तो फिर कोई विवाद ही न रहे.....
सुन्दर रचना!!

बी एस पाबला said...

कुछ लोग इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता भी कहते हैं।

सारा प्रकरण खेदजनक

रज़िया "राज़" said...

मन को छू लेनेवाली कविता के लिये बधाई। आपके विचारों से सहमत हुं भाई। काश! सभी ऐसा सोचते।

Suresh Chiplunkar said...

"...क्या यह ब्लॉगिंग और ब्लॉग जगत में धर्म का प्रवेश है..." बिलकुल नहीं। यह "राष्ट्रवाद" और "कट्टरता" के बीच का विवाद है, और किसी बड़े आदमी ने कहा है कि "जो तटस्थ रहेगा, समय गिनेगा उनके भी अपराध…" :)

कामोद Kaamod said...

@ सुरेश चिप्लुंकर जी - आप इसे "राष्ट्रवाद" और "कट्टरता" के बीच का विवाद" बताते हैं लेकिन जब राष्ट्रवाद की बात आती है तो धार्मिक कट्टरता बीच में क्यूँ आ जाती है!!! क्या यह राष्ट किसी धर्म विशेष अथवा जाति विशेष का है!!!? मेरी जानकारी इस बात का समर्थन नहीं करती।

कामोद Kaamod said...

@ सुरेश चिप्लुंकर जी - आप इसे "राष्ट्रवाद" और "कट्टरता" के बीच का विवाद" बताते हैं लेकिन जब राष्ट्रवाद की बात आती है तो धार्मिक कट्टरता बीच में क्यूँ आ जाती है!!! क्या यह राष्ट किसी धर्म विशेष अथवा जाति विशेष का है!!!? मेरी जानकारी इस बात का समर्थन नहीं करती।

ओम आर्य said...

बेहद सुल्झी और प्रेरक कविता.......अतिसुन्दर भाव और शब्द जो रचना को सार्थक बना दिया है ......अतिसुन्दर

Anonymous said...

Is se achhi kavita to koi bachha likh le.
tumhare apne hi shabdo me-
लेकिन जब राष्ट्रवाद की बात आती है तो धार्मिक कट्टरता बीच में क्यूँ आ जाती है!!!
yani ap bhi mante he ki rastrawad aur kattarpan do alag-alag siro par khadi cheeje he. manthan karo, baat khud samajh me aa jawegi.

खुशदीप सहगल said...

कामोदजी आपको सैल्यूट, मेरा इस बारे में यही कहना है-
इंसान का इंसान से हो भाईचारा,
यही पैगाम हमारा...