
Wednesday, April 16, 2008
Tuesday, April 15, 2008
क्या ऐसा भी हो सकता है??
Saturday, April 12, 2008
आस्था और पुनर्जन्म
उपनिषदों में कर्म तथा पुनर्जन्म की अवधारणाओं को एक सिद्धान्त का रूप दिया गया है. कठोपनिषद् के अनुसार कि मृतक की आत्मा नया शरीर (पुनर्जन्म)लेती है. आत्मा अपने कर्म तथा ज्ञान के अनुसार जड वस्तुओं जैसे पेड़ या पौधों का स्वरूप भी ग्रहण कर सकती है.
न जायते भ्रियते भ्रियते वा कदाचिन्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः।
अजो नित्यः शाश्वतोअयं पुराणों न हन्यते हन्यमाने शरीरे।।
वासांसि जीर्णानियथा विहाय नवानि गृहान्ति नरोअराणि।
तथा शरीराणि विहाय जीर्णान्यन्यानि संयाति नवानि देही।।
मृत्यु से आत्मा का अन्त नहीं होता, आत्मा विभिन्न योनियों में जन्म लेती है. चौरासी लाख योनियों में भ्रमण करने के पश्चात् जीव मनुष्य जैसे दुर्लभ शरीर को प्राप्त करता है. योनियों में क्रमशः विकासवाद के सिद्धांत का पालन किया जाता है. अर्थात् स्वेदज, उद्भिज, अन्डज, जरायुज क्रमशः एक के बाद दूसरी कक्षा की योग्यता और शक्ति बढ़ती जाती है. स्वेदज जीव में जितना ज्ञान और विचार है, उसकी अपेक्षा उद्भिजों की योग्यता बढ़ी हुई है. इसी प्रकार योग्यता बढ़ते-बढ़ते शरीरों की बनावटी में भी अन्तर होने लगता है और पूर्ण उन्नति एवं विकास होने पर मानव शरीर प्राप्त हो जाता है. मनुष्य योनि इस संसार की सर्वश्रेष्ठ योनि है. अन्ततः इसी जीव नीचे से ऊपर की ओर या तुच्छता से महानता के ओर लगातार बढ़ते चले आ रहे हैं. आत्मा ही बढ़ते-बढ़ते परमात्मा हो जाती है. अर्थात पुनर्जन्म से मुक्त हो जाती है.
पुनर्जन्म की धुरी नैतिकता में रखी गई है जिससे समाज तथा व्यक्ति दोनों को ही लाभ होता है. इसमें विश्वास करने वाला व्यक्ति यह मानता है कि 'मेरी जैसी ही आत्मा सबकी है और सबकी जैसी ही मेरी आत्मा है.' मतलब ये कि ''मेरी आत्मा की अवस्था भूतकाल में अन्य जीवों जैसी हुई है और भविष्य में भी हो सकती है. सभी जीव किसी न किसी समय मेरे-माता-पिता आदि सम्बंधी रहे हैं और भविष्य में भी रह सकते हैं.''
इससे मनुष्य का सब जीवों के प्रति प्रेम और भ्रातृत्व भाव बढ़ता है इससे यह भी पता चलता है कि जीव की कोई योनि शाश्वत नहीं है. हिन्दू धर्म के अनुसार परलोक में अनंतकालीन स्वर्ग या अनन्तकालीन नरक नहीं है, जीव के किसी जन्म या किन्हीं जन्मों के पुण्य या पापों में ऐसी शक्ति नहीं है कि सदा के लिए उस जीव या भाग्य निश्चित कर दे. वह पुरुषार्थ से सुपथगामी होकर आत्म-उन्नत अवस्था को प्राप्त कर सकता है.
(भारतीय संस्कृति के आधारभूत तत्व से)
न जायते भ्रियते भ्रियते वा कदाचिन्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः।
अजो नित्यः शाश्वतोअयं पुराणों न हन्यते हन्यमाने शरीरे।।
वासांसि जीर्णानियथा विहाय नवानि गृहान्ति नरोअराणि।
तथा शरीराणि विहाय जीर्णान्यन्यानि संयाति नवानि देही।।
मृत्यु से आत्मा का अन्त नहीं होता, आत्मा विभिन्न योनियों में जन्म लेती है. चौरासी लाख योनियों में भ्रमण करने के पश्चात् जीव मनुष्य जैसे दुर्लभ शरीर को प्राप्त करता है. योनियों में क्रमशः विकासवाद के सिद्धांत का पालन किया जाता है. अर्थात् स्वेदज, उद्भिज, अन्डज, जरायुज क्रमशः एक के बाद दूसरी कक्षा की योग्यता और शक्ति बढ़ती जाती है. स्वेदज जीव में जितना ज्ञान और विचार है, उसकी अपेक्षा उद्भिजों की योग्यता बढ़ी हुई है. इसी प्रकार योग्यता बढ़ते-बढ़ते शरीरों की बनावटी में भी अन्तर होने लगता है और पूर्ण उन्नति एवं विकास होने पर मानव शरीर प्राप्त हो जाता है. मनुष्य योनि इस संसार की सर्वश्रेष्ठ योनि है. अन्ततः इसी जीव नीचे से ऊपर की ओर या तुच्छता से महानता के ओर लगातार बढ़ते चले आ रहे हैं. आत्मा ही बढ़ते-बढ़ते परमात्मा हो जाती है. अर्थात पुनर्जन्म से मुक्त हो जाती है.
पुनर्जन्म की धुरी नैतिकता में रखी गई है जिससे समाज तथा व्यक्ति दोनों को ही लाभ होता है. इसमें विश्वास करने वाला व्यक्ति यह मानता है कि 'मेरी जैसी ही आत्मा सबकी है और सबकी जैसी ही मेरी आत्मा है.' मतलब ये कि ''मेरी आत्मा की अवस्था भूतकाल में अन्य जीवों जैसी हुई है और भविष्य में भी हो सकती है. सभी जीव किसी न किसी समय मेरे-माता-पिता आदि सम्बंधी रहे हैं और भविष्य में भी रह सकते हैं.''
इससे मनुष्य का सब जीवों के प्रति प्रेम और भ्रातृत्व भाव बढ़ता है इससे यह भी पता चलता है कि जीव की कोई योनि शाश्वत नहीं है. हिन्दू धर्म के अनुसार परलोक में अनंतकालीन स्वर्ग या अनन्तकालीन नरक नहीं है, जीव के किसी जन्म या किन्हीं जन्मों के पुण्य या पापों में ऐसी शक्ति नहीं है कि सदा के लिए उस जीव या भाग्य निश्चित कर दे. वह पुरुषार्थ से सुपथगामी होकर आत्म-उन्नत अवस्था को प्राप्त कर सकता है.
(भारतीय संस्कृति के आधारभूत तत्व से)
Friday, April 11, 2008
फिर भी उनको मेरा मित्र बनना है
पिछले कई दिनों से लिखना नहीं हो पा रहा है. इस बीच ओर्कुट के अपने कुछ अनुभवों को रखने की कोशिश कर रहा हूँ.
उनको मेरा मित्र बनना है
आया था ऑरकुट पर
खोजने पुराने दोस्तों को
कुछ मिले, कुछ कुछ नहीं,
पर यहाँ भी दोस्तों की कमी नहीं.
सोचा
इस अथाह सागर में
क्यूँ न मैं भी नए दोस्त चुनूँ!
जो मेरी पसंद के हों
मुझे समझते हों,...
लेकिन कोई दोस्त बनना नहीं चाहता था
सबसे पहले मुझे देखना चाहता था.
सुरक्षा के लिहाज़ से
मैं अपनी तस्वीर नहीं लगाता था,
बस कभी फूलों की
कभी सवाल भरे चित्र सजाता था.
पर भला वो किसको पसंद आते?
लोग विजिट तो करते पर
पर यूं ही चले जाते.
अब जबसे तस्वीर लगायी है,
पहचान नयी मैंने पायी है.
रोज़ २० रिक्वैस्ट आते हैं
50 स्क्रैप्स आते हैं,
कुछ लोग आकर्षण से
तो कुछ सेक्स के लिहाज़ से आते हैं.
आश्चर्य है मुझको
ये कैसी विडम्बना है ????
जो चित्र है मेरा
वो छद्म है
फिर भी उनको मेरा मित्र बनना है .......
उनको मेरा मित्र बनना है
आया था ऑरकुट पर
खोजने पुराने दोस्तों को
कुछ मिले, कुछ कुछ नहीं,
पर यहाँ भी दोस्तों की कमी नहीं.
सोचा
इस अथाह सागर में
क्यूँ न मैं भी नए दोस्त चुनूँ!
जो मेरी पसंद के हों
मुझे समझते हों,...
लेकिन कोई दोस्त बनना नहीं चाहता था
सबसे पहले मुझे देखना चाहता था.
सुरक्षा के लिहाज़ से
मैं अपनी तस्वीर नहीं लगाता था,
बस कभी फूलों की
कभी सवाल भरे चित्र सजाता था.
पर भला वो किसको पसंद आते?
लोग विजिट तो करते पर
पर यूं ही चले जाते.
अब जबसे तस्वीर लगायी है,
पहचान नयी मैंने पायी है.
रोज़ २० रिक्वैस्ट आते हैं
50 स्क्रैप्स आते हैं,
कुछ लोग आकर्षण से
तो कुछ सेक्स के लिहाज़ से आते हैं.
आश्चर्य है मुझको
ये कैसी विडम्बना है ????
जो चित्र है मेरा
वो छद्म है
फिर भी उनको मेरा मित्र बनना है .......
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